Saturday, 18 May 2013

मन विचार

कभी कभी मेरे मन के द्वारे
दस्तक सी दे जाते हो
और कभी खुले नयनों में
सपने भी दिखलाते हो
कभी रात के प्रहरी बन तुम
अक्सर मुझे जगाते हो
अनबूझी सी एक पहेली
आकर के सुलझाते हो
रजनी की गोदी में बैठे
तारों सा जगमगाते हो
कभी अचानक चुपके से तुम
मधुर स्वरों में गाते हो
कभी सिमटकर पलकें मूंदे
अवचेतन से हो जाते हो
कोरों में नयनों की मेरे
कजरी सा रम जाते हो
कस्तूरी सा बन कर के तुम
घर मेरा महकाते हो
झोंका एक पवन का बन तुम
दूर बहुत उड़ जाते हो
कभी ज्वार सा आकर के तुम
तट को भी धो जाते हो
और कभी भाटा से बनकर
लहरों में खो जाते हो
कैसे बाँधूं बंधन में तुमको
तुम आते और चले जाते हो
विस्तृत से आकाश में खोकर
दूर खड़े मुस्काते हो

                           सविता अग्रवाल "सवि "