Sunday, 2 February 2014

                                     संस्मरण
माँ की मृत्यु हुए क़रीब दो वर्ष बीत गए थे | एक दिन माँ की बहुत याद आ रही थी  सोचा कि भाई भाभी से भी मिल आउंगी  और भैया भी बीमार चल रहें है उन्हें भी देख आउंगी | पति से कहकर अपना टिकट कराया और माँ के घर चली गई | भाई भाभी ने बड़े प्यार से स्वागत किया और जिस कमरे में माँ की चारपाई होती थी वही मेरे
सोने का प्रबंध कर दिया | मैंने कमरे को सब ओर से देखा - माँ पिताजी की तस्वीर सामने की दीवार पर लगी हुई थी और दोनों की तस्वीरों पर फूलों का हार लगा हुआ था | मैंने माँ और पिताजी की तस्वीर को प्रणाम किया, लगा दोनों ही मुस्कराकर मेरा स्वागत कर रहे हैं ह्रदय खुश हो गया परन्तु एक खालीपन उस कमरे में छाया हुआ था | मेरी आँखों के सामने वह पुराना दृश्य घूम गया जहां माँ की चारपाई होती थी उसके साथ ही एक छोटी सी मेज़ हुआ करती थी जिसे माँ ने एक बार पिताजी के साथ जाकर मेले से  दो रूपए में खरीदा था और उस मेज़ का नाम भी दो रूपए वाली मेज़ रख दिया था जब भी माँ को अपनी दवाई की ज़रुरत होती तो कहतीं थी ज़रा मेरी दवाई तो ले आ, वही दो रूपए वाली मेज़ पर रखी है | हम सभी बहन भाई खूब हँसते थे और माँ से कहते कि अब आप इसका नाम बदल कर पुरानी छोटी मेज़ रख लें परन्तु माँ को तो बस दो रूपए वाली मेज़ कहना ही अच्छा लगता था | हम सब भी उसके आदि हो गए थे |चारपाई के पास ही दीवार पर माँ ने पिताजी से कहकर एक खूंटी लगवाई थी क्योंकि रात को सोने से पहले माँ के पास एक तुलसी की माला थी वह जपा करतीं थीं जिसे वे अपने हाथ से सिली हुई एक छोटी सी थैली में रखतीं थीं और सोते समय खूंटी पर लटका दिया करतीं थी उन्हें पसंद नहीं था कि माला बिस्तर पर रखी जाए | एक स्कार्फ जिसे माँ ने सर्दी के दिनों में धूप में बैठ कर बनाया था सोने से पहले वे हमेशा उसे तकिये के नीचे रख दिया करतीं थी और सुबह उठकर पहन लिया करतीं थीं | एक एक कर सभी बातें मेरे मस्तिष्क में चलचित्र की तरह घूम रही थीं | परन्तु अब दृश्य बदल गया था |.
               कमरे में  जिस चारपाई पर माँ सोतीं थीं उसकी जगह पर आधुनिक पलंग आ गया था ज़मीन पर रखी मेज़ की जगह पर सुंदर से गलीचे पर बड़ा सा फूलदान रखा हुआ था मैंने पलंग पर बैठ कर लम्बी सांस ली और एकटक दीवार पर लगी माँ पिताजी की तस्वीर को देखती रही | अपना पर्स टाँगने के लिए खूटी देखी वह भी नहीं थी उसका निशाँ भी मिटा दिया गया था दीवारों पर हरे रंग की जगह पर हलके पीले रंग की छटा बिखर रही थी |
किसी तरह अपना सामान मैंने अपने सूटकेस पर ही रख दिया और माँ पिताजी की यादों में खोयी रही पता न चला कब आँख लग गई और सुबह के पांच बजे पास की मस्जिद की अजान से मेरी आँख खुल गई | अजान सुनकर माँ हमेशा कहा करतीं थीं कि.. लो सुबह हो गई है अपने अपने कामों में लग जाओ | आज यह कहने वाली माँ नहीं थीं |
                                                                                                     सविता अग्रवाल "सवि"

Wednesday, 22 January 2014

क्षणिकाएं

कभी बोल देते
प्यार के कुछ शब्द
संभाल कर रख लेती
संदूकची में अपनी
बना लेती उन्हें
डूबती नैया  में पतवार
उस पतवार को हाथों में थामे
धीरे धीरे पार कर लेती
नदी की गहराई
और पढ़ लेती ,तुम्हारा मन |



कुम्हार के कच्चे बर्तन की माटी सी
पड़ी थी पानी से सराबोर
खुश थी ,मुझे पता था
मैं ढल जाऊंगी किसी भी रूप में
पर .... पता न चला कब ...
पत्थर बन गई वह माटी
आज उसे तराशने के लिए
छेनी हथोड़े की ज़रुरत आन पड़ी है |



दूसरा छोर है मुस्करा रहा
मुझे अपने क़रीब बुला रहा
मेरी असमर्थता जान छटपटा रहा
दूर खड़े हम दोनों एक दूजे के
मिलन की कल्पना से व्याकुल हैं
एक वृहत समाज बीच में खड़ा है
अथाह समुद्र बन कर
बाधक हमारे मिलन में बना हुआ
मैं और तुम यूं ही देख रहे हैं
एक दूजे को --पता नहीं कब से और कब तक ....

                                           सविता अग्रवाल "सवि"




 

Wednesday, 27 November 2013


                कहानी 

         माँ की आँख से देखा संसार
 शाम के करीब पांच बजे थे | सूरज अस्त का समय हो रहा था | टीना रोजाना अपनी खिड़की से सुबह का उगता सूरज और शाम का डूबता सूरज देखा करती थी | यही क्रम पिछले पांच वर्षों से चल रहा था | टीना ने देखा कि एक करीब चार वर्षीय बालक बाहर सड़क पर अपनी माँ से गोदी में आने की जिद्द कर रहा था, माँ के हाथ में कुछ सामान था दोनों हाथ भरे हुए थे  वह बालक को गोद में नहीं उठा सकती थी | बालक वहीं खडा हो गया और आगे चलने का नाम नहीं ले रहा था | माँ के बहुत समझाने पर और लालच देने पर भी वह वहीं खडा रहा, माँ ने कई बार प्रयत्न किया कि वह सामान भी संभाले और बच्चे को भी गोदी में ले ले परन्तु हाथ से कुछ न कुछ गिर ही जाता था | अंत में माँ ने अपना मोबाइल निकाला और शायद टैक्सी बुलाने के लिए फ़ोन लगाया, और बच्चे के साथ सड़क के किनारे पर बस स्टॉप के पास खडी हो गयी और टैक्सी के आने का इंतज़ार करने लगी | थोड़ी देर बाद एक टैक्सी रुकी और माँ बेटे को लेकर चली गयी | परन्तु सामने देखते देखते टीना को पांच साल पहले की वह घटना याद आ गयी जब वह कॉलेज से आ रही थी और एक बस से टकरा कर बेहोश हो गयी थी उसे अस्पताल ले जाया गया था वहां जाकर पता चला कि उसकी कई हड्डियां टूट गयीं थी और आँखों की रौशनी भी जाती रही थी | तीन माह के बाद हड्डियां तो जुड़ गयीं परन्तु डाक्टर उसकी आँखों की रौशनी वापस नहीं ला सके | अस्पताल के खर्च से माँ (तृप्ति ) और पिता (राजेश ) टूट चुके थे | बेटी को दिखाई न देने से दोनों ही बहुत दुखी थे | एक दिन टीना की माँ  ने डाक्टर व्यास जो आँखों के डाक्टर थे उनसे बात की और कहा कि उसकी एक आँख टीना को लग सकती है क्या ? सभी टेस्ट हुए अंत में डाक्टर ने कहा कि यह संभव है | माँ ने डाक्टर से यह भी कहा कि इस बात को अभी टीना को न बताया जाए | राजेश को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई |

     समयानुसार एक दिन माँ तृप्ति की एक आँख निकाल कर पत्थर की आँख लगा दी गयी | और टीना को बिना बताये ही कि किसकी आँख उसे लगाई जा रही है, माँ की आँख उसे लगा दी गयी | तीन चार दिन तक पट्टी बंधी रही और जब पट्टी खुलने का दिन आया तो टीना से डाक्टर व्यास ने पूछा कि तुम सबसे पहले किसे देखना चाहोगी ? टीना ने कहा कि मैं उसे देखना चाहूंगी जिसकी आँख से मैं सब देख सकूंगी | धीरे धीरे टीना की आँख से पट्टी खोली गयी तो टीना ने देखा कि माँ सामने खड़ी है और उसकी एक आँख पर पट्टी बंधी है टीना की दोनों बाँहें माँ के आलिंगन के लिए खुल गयीं | माँ ने भी टीना को गले से लगाया और कहा - बेटी ! अब तुम यह संसार जो बहुत खूबसूरत है इसे देख सकोगी और अनुभव कर सकोगी | टीना का दिल भर आया और वह यूं ही देर तक माँ से लिपटी रही | तभी डाक्टर व्यास ने टीना से कहा कि टीना अब तुम अपनी माँ की आँख से सारा संसार देख सकती हो | माँ का यह त्याग और ऋण टीना कभी नहीं चुका पायेगी | यही सोचते सोचते वह समय आ गया जब सूरज अस्ताचल में प्रवेश कर रहा था इस मनमोहक दृश्य के लिए टीना पांच बजे से ही खिड़की में आकर खड़ी हो जाती थी वह दृश्य देखना टीना को बहुत अच्छा लगता था |वह भाग कर अन्दर गयी और माँ से लिपट कर बोली _माँ ! मैं हर जन्म में तुम्हारी ही बेटी बनूँ, यही कामना है मेरी | 

                                       सविता अग्रवाल “सवि”       

 



 

Wednesday, 13 November 2013


दर्पण

टूटे दर्पण के टुकड़ों को मैं
मिला मिला कर जोड़ रही
जोड़ कर दर्पण को मैं अपने
बिम्ब अनेकों देख रही
एक टुकड़ा कहता है मुझ से
तू सुर-सुंदरी बाला है
बोला तपाक से दूजा टुकड़ा
तू मधुशाला की हाला है
तीजा टुकड़ा क्यूँ चुप रहता
बोला तू है ममता की मूरत
चौथा छोटा टुकड़ा बोला
दाग़ भरी तेरी सूरत
तोड़ कर गिनती बीच में सारी
बोला एक षटकोणी टुकड़ा
तू है मतवाली सी रूपा
और तू एक कुल-बाला है
पड़ा हुआ था किंचित सा कण
वह भी मुँह से बोल गया
मेरे रूप की अनगिन बातें
वह सहसा ही खोल गया
होकर निराश बातों से उसकी
मैंने मुख को मोड़ लिया
दर्पण के टूटे टुकड़ों को
दर्पण पर ही तोड़ दिया | 

                                  ~~ सविता अग्रवाल सवि”~~

Monday, 11 November 2013


       हाइकु

१.       गूंजे दुन्दुभी
लिए संकल्प साथ
शंख नाद सी
 
   २.       स्वप्न सजे
रह गए अधूरे
माँ बनने के  

३.       कैसी ठिठोली
बूँदें गिरी नभ से
भीगी न चोली  

४.      श्रृंगार बिना
लगता है मुझको
दर्पण कोरा 

५.      बजे संगीत
पायलिया के जैसा
मन घायल 

६.      भरा समुन्द्र
फिर भी मैं प्यासी
सूखी रेती सी 

७.       सांझ की बेला
 लगता धरा पर
 रंग उकेरा 

८.      निखरा रूप
अविस्मरणीय है
लगता खूब 

९.      उम्र गुज़री
समझ भी न पाई
रही अधूरी 

१०.   भीड़ में कहीं
 दिवस बीत गया
 शाम हो गयी 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

       "जीवन मंथन"         
                        मैं  तो  काची  माटी  थी
                        जित चाहो मुझको ले जाओ
                        मन निर्मल था गंगा की तरह
                        जिसमें डुबकी ले हर बोलो
                        निर्मल मैले का द्वंद था
                        नयनों में निश्छ्ल क्रन्दन था
                        फूलों पर ओस की बूंद धरी
                        ऎसी कोमल थी देह मेरी
                        तेरा था मेरा था
                        मन मेरा कोरा कागज़ था
                        लिख डालो जिस पर पाती खरी
                        हर शाम एक नया सवेरा था
                        सागर की लहरों की भांति
                        उठते गिरते थे भाव मेरे
                        उन भावों में ना कटुता थी
                        मन सागर से भी गहरा था
                        पर कितने दिन ये रहना था
                        एक दिन तो ये सब सहना था
                        वह दिन आया जब होनी को
                        अपना रंग रूप दिखाना था
                        भूगर्भ में आते हल्लन सा
                        पृथ्वी पर आते अंधड़ सा
                        एक तूफ़ानों का ज्वार उठा
                        हिमगिरि से गिरते हिम जैसा
                        मथ डाला काची माटी को
                        मन को ना छोड़ा निर्मल भी
                        भावों पर कस कर किया प्रहार
                        शिखरों से गिरते पत्थरों सा 
                        आंधी के झोंकों से टकरा
                        फूलों पर से सब ओस झड़ी
                        पेड़ों की टूटी डाली सी
                        मानों अब है ये देह मेरी
                        मैं जान गई हूं अब ये तो
                        जीवन इसको ही कहते हैं
                        कुछ और नहीं था ये तो बस
                        एक जीवन मंथन गहरा था
                                                - सविता अग्रवाल "सवि" -

Saturday, 18 May 2013

मन विचार

कभी कभी मेरे मन के द्वारे
दस्तक सी दे जाते हो
और कभी खुले नयनों में
सपने भी दिखलाते हो
कभी रात के प्रहरी बन तुम
अक्सर मुझे जगाते हो
अनबूझी सी एक पहेली
आकर के सुलझाते हो
रजनी की गोदी में बैठे
तारों सा जगमगाते हो
कभी अचानक चुपके से तुम
मधुर स्वरों में गाते हो
कभी सिमटकर पलकें मूंदे
अवचेतन से हो जाते हो
कोरों में नयनों की मेरे
कजरी सा रम जाते हो
कस्तूरी सा बन कर के तुम
घर मेरा महकाते हो
झोंका एक पवन का बन तुम
दूर बहुत उड़ जाते हो
कभी ज्वार सा आकर के तुम
तट को भी धो जाते हो
और कभी भाटा से बनकर
लहरों में खो जाते हो
कैसे बाँधूं बंधन में तुमको
तुम आते और चले जाते हो
विस्तृत से आकाश में खोकर
दूर खड़े मुस्काते हो

                           सविता अग्रवाल "सवि "